#MartyrsDay: हमारे इतिहास में क्यों गुमनाम हैं आपके भगत सिंह?

Team dPILLAR

2018-04-23 08:22:50



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"यदि मैं बख्श दिया गया तो आपदा आ जाएगी. अगर मैं मर जाऊं तो चारो ओर मुस्कुराहटें होंगी. भारत की माताएं अपने बच्चों को भगत सिंह का अनुकरण करने के लिए कहेंगी और इस तरह क्रांतिकारियों की संख्या इतनी हो जाएगी कि शैतानी शक्तियों के लिए क्रांति को रोकना असंभव हो जाएगा."

- भगत सिंह.

 

आज 23 मार्च को शहीद दिवस है. 1931 को इसी दिन लाहौर के सेंट्रल जेल में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी पर चढ़ाया था.

भगत सिंह को लेकर हमारे समाज में बहुत तरह की बातें होती हैं. उम्मीद है कि भगत सिंह को लेकर आपकी भी कोई बात होगी. इस शहीद दिवस पर हमारी कोशिश है कि भगत सिंह को लेकर हर बात हो.

 

www.dpillar.com पर आगे पढ़िए की खिड़की के पार से  एम रमन गिरी की ये रिपोर्ट-.

 

इन्कलाब जिंदाबाद.

हसरत मोहानी के दिये ये शब्द आज भी एक गुब्बार पैदा करते हैं. एक गुब्बार, उन तमाम चुप्पियों के ख़िलाफ़ जिसको हम बेवज़ह सहन कर रहे होते हैं.

ये नारा हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के पुराने साथी (चंद्रशेखर आज़ाद, शचीन्द्रनाथ सान्याल , जतीन्द्रनाथ दास,अशफ़ाक उल्लाह खां , राजेन्द्र लाहिरी, रौशन सिंह , राम प्रसाद बिस्मिल ) और HSRA (हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ) के साथी चंद्रशेखर आज़ाद , भगत सिंह ,सुखदेव थापर ,राजगुरु , बटुकेश्वर दत्त , भगवतीचरण वोहरा , शिव वर्मा ) समेत उस वक्त के हजारों क्रांतिकारियों की चेतना का परिचायक था.


स्कूल में शहीद दिवस, स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस जैसे मौकों पर भगतसिंह , सुखदेव ,राजगुरु इन सब की मूर्ति तो होती पर चर्चा सिर्फ गांधी , सुभाष चंद्र बोस जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की होती थी. बहुत होता तो चंद्रशेखर आज़ाद पर थोड़ी बात कर लेते. ऐसा लगता जैसे इन क्रांतिकारियों की तस्वीर मानो सिर्फ जगह भरने के लिए रखी गयी हो. मन में हमेशा एक कौतूहल होता कि इनके योगदान को हम क्यों नहीं याद करते. क्या ये सिर्फ़ जगह भरने वाले लोग थे!

इतिहास की विडंबना यही है कि ये हमेशा दावा करता है कि हम आपको सच दिखलायेंगे, पर किसके हिस्से का? शायद ये वो बताना भूल जाता है. अगर हमें इन क्रांतिकारियों को याद रखना है तो इतिहास को भूलना होगा. क्योंकि जिस तरीके का इतिहास हमें स्कूल , कॉलेज या विश्वविद्यालय में सिखाया गया वो हमारे हिस्से के सच से महदूद ही रहा.

"अगर हमको अपने हिस्से के सच से वाकिफ़ होना है तो हमें अपने हिस्से का इतिहास भी ख़ुद ही गढ़ना होगा."

 

आज जब मैं ये लेख लिख रहा हूं तब हमारा पूरा देश शहादत में डूबा रहेग. दिनभर ट्विटर से लेकर फेसबुक, इंस्टाग्राम सब पर तरह-तरह की देशभक्ति शेर और अपने हिस्से वाला इतिहास साझा किया जाएगा. कमी रह गयी तो कहीं-कहीं राजनीतिक पार्टियों द्वारा संगोष्ठी भी कर ली जाएगी. उनमें भी संगोष्ठी का शीषर्क क्रांतिकारियों के त्याग को लेकर नहीं, बल्कि माननीय महोदय मुख्य अतिथि के हिसाब से तय किया जाएगा ताकि उनको बोलने में असुविधा न हो. और मैं भी इस परिपाटी से अलग थलग नहीं हूं जो उनके शहादत पर लेख लिखकर कोई महान काम कर रहा.
 

हम हमेशा अपने आदर्श, अपनी प्रेरणा ऐसे किसी चमत्कारी पुरुष में ढूंढते है जिसके याद कर लेने भर से या उसके प्रभाव भर से हमारा जीवन धन्य हो जाये. तनिक भी ये नहीं सोचते कि क्या होता अगर उस आदर्श पुरुष ने भी यही सोचा होता? और ये समस्या सिर्फ मेरी या फिर आपकी नहीं बल्की आज की पूरी पीढ़ी की है.

ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब सिर्फ और सिर्फ आप के पास है , कोई दूसरा आपके सवालों का जवाब कैसे दे सकता है. हमें अपने हिस्से की लड़ाई खुद लड़नी होती है, क्योंकि आपके इस सफ़र में आप एकलौते हमसफर होते हैं जो अपनी हर परिस्थिति से वाकिफ़ होता है. बाकी सब तो महज़ एक क़िरदार हैं.

यहाँ पर हमारी कोशिश ये तनिक भी नहीं कि आपको मुफ्त के इतिहास से अवगत कराएं. चाहते तो हम भी सितम्बर 1987 में भगत सिंह के साथी रहे शिव वर्मा के सम्पादन में कानपुर के समाजवादी साहित्य सदन ने उनके कुछ लेख और पत्र “भगत सिंह की चुनी हुई कृतियाँ” प्रकाशित की थी, उनका ज़िक्र कर सकते थे.

'मैं नास्तिक क्यों हूं' शीर्षक से लिखे गए उस लेख को भी कोट कर लेता जिसमें भगत सिंह ने इंसान की अकर्मण्यता और ईश्वरीय भक्ति के दिलचस्प रहस्यों का ज़िक्र किया था. या फिर प्रोफेसर चमन लाल के उन तमाम शोध लेखों का जिनमे वो बताते हैं कि भगत सिंह महज़ क्रांतिकारी नहीं बल्कि एक विचारधारा के तौर पर ज्यादा व्याप्त हैं.

कलाकार , रंगकर्मी पीयूष मिश्रा की लिखी पुस्तक 'गगन दमामा बाज्यो' जिसमें वो भगत सिंह के उस व्यक्तित्व का ज़िक्र करते है जो ' मैं एक नास्तिक हूँ ' जैसा लेख भी लिखता है, वहीं दूसरी ओर अपनी जेब में गीता और विवेकानंद की तस्वीर रखता है. उसके बारे में भी चर्चा कर लेता.

मगर, इन तमाम अनुभवों से आपको ख़ुद गुजरना होगा. तब शायद आपको वो भगत सिंह मिलें. जिसकी आपको तलाश है.

क्या आप अपने ज़िन्दगी का कुछ हिस्सा देना चाहते हैं उन क्रांतिकारियों को समझने के लिए जिनकी सोंधी खुशबु आज भी उस आज़ादी में महकती है, जिनमें हम-आप ज़िन्दा हैं. या फिर आप भी उस इंसान की तरह हो चले हैं जिसका जिक्र पाश ने अपनी इस कविता में किया है.

 

'मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती,
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती,
ग़द्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती.
सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना.
तड़प का न होना, सब कुछ सहन कर जाना.
घर से निकलना काम पर,
और काम से लौटकर घर आना.
सबसे ख़तरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना.

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